Blog
किताबों से स्क्रीन तक बदलते दौर का पाठक

मनुष्य सामाजिक प्राणी है और समाज एक समय जागरण के लिए किताबों के सहारे रहता था, जन-जागरण के लिए कोई अन्य साधन अधिक उपलब्ध नहीं होने से घर-परिवार में चेतना प्रस्फुटन का कार्य किताबें करती थीं। वर्तमान में इन किताबों वाले समय में बदलाव आया है। परिवर्तन वैसे भी संसार का महत्त्वपूर्ण नियम है। समय के साथ-साथ समाज बदलता है, और साथ ही, उस समाज की संवेदनाएँ, रुचियाँ, जीवन शैली, कार्यव्यवहार इत्यादि सब बदलते हैं। उसी बदलाव के कारण शब्द साधना का स्वरूप भी बदलने लग गया है।
आज का समय एक विचित्र द्वंद्व का साक्षी बन रहा है, एक ओर शब्दों की परंपरा, जो सदियों से मनुष्य की चेतना को गढ़ती आई है, वहीं दूसरी ओर कुछ सेकंड की “रील”, जो क्षणिक आकर्षण के साथ-साथ हमारी एकाग्रता को खंडित कर रही है। ‘रील बनाम रीड’ का यह संघर्ष केवल माध्यम का नहीं, बल्कि मनुष्य की बौद्धिक और संवेदनात्मक दिशा का प्रश्न बन चुका है।
कभी पढ़ना एक प्रकार की साधना थी। पुस्तक के साथ बैठना, शब्दों में उतरना, विचारों के साथ संवाद करना वर्तमान पीढ़ी से कहीं दूर जा रहा है। आज वही प्रक्रिया ‘स्क्रॉल’ में सिमट गई है। उँगलियों की गति तो बढ़ी है, पर विचारों की गहराई घटती नज़र आ रही है। रील्स की तेज़, चटपटी और तात्कालिक दुनिया ने धैर्यपूर्ण पढ़ने को चुनौती दे दी है।
एक समय किताब को साथ रखकर पढ़ने और बढ़ने वाली पीढ़ी मोबाइल की स्क्रीन की आदि होने लग गई है। जो लोग कभी किताबों को पढ़ते नहीं थकते थे, आज वे 30 से 90 सेकण्ड में अध्ययन का आँकलन करने में जुटे हुए हैं।
इसी रीलजीवी पीढ़ी की भी अपनी एक समस्या है, यह किसी कंटेन्ट पर बहुत देर तक नहीं टिकती, कुछ पलों में यह निर्धारित करने लगी है कि फलाँ कंटेंट हमारे काम का है अथवा नहीं।
रील का स्वभाव है क्षणिक प्रभाव, त्वरित मनोरंजन और तुरंत प्रतिक्रिया। वहीं, ‘रीड’ अर्थात् पढ़ना एक धीमी प्रक्रिया है, जो समय, एकाग्रता और आत्मसंवाद की माँग करती है। रील हमें दिखाती है, पर पुस्तक हमें सोचने और समझने पर विवश करती है। रील हमें हँसाती या चौंकाती है, पर साहित्य हमें भीतर तक बदलने की क्षमता रखता है। साहित्य में चेतना होती है, रील में क्षणिक रोकने की क्षमता। आने वाला युग रील का हो सकता है, इसलिए साहित्यकारों को भी विचार करना चाहिए कि आने वाले पाठकों को कैसे तीस सेकण्ड के मायाजाल से निकाल पाएँ!
वर्तमान दौर का पाठक ‘स्क्रॉल’ करता है, ‘स्वाइप’ करता है, पर ठहर कर पढ़ता कम है। वह शीर्षकों में अर्थ खोजता है, सारांशों में संतोष पाता है। परिणामस्वरूप, साहित्य का वह गहन रसास्वादन, जो मनुष्य को भीतर से बदलता है, कहीं पीछे छूटता जा रहा है। प्रश्न यह नहीं है कि पाठक कम हो गए हैं, प्रश्न यह है कि क्या पाठक अब भी उतना ही संवेदनशील, धैर्यवान और जिज्ञासु है?
इस परिवर्तन के पीछे केवल तकनीक ही नहीं, बल्कि हमारी जीवनशैली भी उत्तरदायी है। तीव्र गति, प्रतिस्पर्धा और समयाभाव ने हमें ‘त्वरित’ बना दिया है। हम सब कुछ शीघ्र चाहते हैं, ज्ञान भी, मनोरंजन भी और संतोष भी। ऐसे में पुस्तकें, जो समय और एकाग्रता की माँग करती हैं, स्वाभाविक रूप से पीछे छूटती प्रतीत होती हैं।
और इस समस्या का समाधान विरोध में नहीं, संतुलन में है। हमें रील को पूरी तरह नकारने के बजाय उसे पढ़ने की ओर प्रेरित करने का माध्यम बनाना होगा। छोटी-छोटी रील्स के माध्यम से पुस्तकों का परिचय दिया जाए, सोशल मीडिया को साहित्य के प्रचार का उपकरण बनाया जाए साथ ही, परिवार, विद्यालय और समाज को मिलकर पढ़ने की आदत को पुनर्जीवित करना होगा। क्योंकि पढ़ना केवल एक कौशल नहीं, बल्कि एक संस्कार है। यह युद्ध किताब और स्क्रीन के बीच का नहीं है, बल्कि इसे युद्ध न मानकर किताब और स्क्रीन के बीच समन्वय की चुनौती को स्वीकार कर कार्य करना होगा।
डॉ. अर्पण जैन ’अविचल’
सम्पादक, मासिक साहित्यग्राम
इंदौर