संपादकीय

पुस्तक संस्कृति से बचेगी भारतीय संस्कृति और भाषाएँ

भारत की संस्कृति सदा से ही ग्रन्थ और पुस्तकों के अनुशासन से समृद्ध श्रुति-स्मृति परम्परा की संस्कृति है। वेद, उपनिषद्, पुराण, बौद्ध त्र...
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संपादकीय

एआई से संकट में आ गई लेखकीय मौलिकता

चिंतन हो अथवा लेखन, सर्जन हो अथवा निर्माण, दृष्टि हो अथवा दृष्टिकोण, रंग हो अथवा चित्रकारी सब कुछ सदा से मौलिक ही आकर्षित करता आ रहा है...
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संपादकीय

पत्रकारिता और साहित्य से घटता हिन्दी और क्षेत्रीय बोलियों का प्रभाव

भाषाएँ और बोलियाँ भारत की न केवल सांस्कृतिक ध्वजवाहक हैं बल्कि इस राष्ट्र का परिचय भी हैं। यह वही एकात्म के चिंतन की संस्कृति है, जिसने...
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संपादकीय

किताबों से स्क्रीन तक बदलते दौर का पाठक

मनुष्य सामाजिक प्राणी है और समाज एक समय जागरण के लिए किताबों के सहारे रहता था, जन-जागरण के लिए कोई अन्य साधन अधिक उपलब्ध नहीं होने से घ...
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संपादकीय

लोकमंगल की कामना की भाषा है हिन्दी

भाषाएँ परस्पर संवाद और संचार की माध्यम होती हैं, जिनकी व्यापकता इस बात से सिद्ध होती है कि उनमें कितना सृजन लोकमंगल को समर्पित है। वैश्...
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संपादकीय

भारतीय वाङ्‌मय में प्रस्फुटित होता बसंत

ऋतुराज बसन्त का आगमन और फिर न केवल प्रकृति प्रदत्त मौसम बासंती होता है बल्कि उस दौरान रची-गढ़ी जाने वाली रचनाएँ भी बासंती रंग में पीली ह...
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संपादकीय

छद्म नारीवाद की भेंट चढ़ता आधुनिक स्त्री विमर्श

वो मोमबत्ती लेकर तो निकली पर असल गुनहगार गायब हो गए, वो नारीवाद और स्त्री स्वच्छन्दता के नाम पर नग्नता को अपनाने लग गई, वो चीख़ने तब लग...
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संपादकीय

साहित्य से विलुप्ति की कगार पर ‘लोक’

दुर्भाग्य! दुःखद! चिंताजनक! अब क्या यही कहना रह गया है लोक के भाग्य में। विगत दो दशकों से साहित्य समाज की चिंताओं से निरंतर लोक, गाँव, ...
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संपादकीय

बुद्धिजीवी साहित्यकारों पर क्यों हावी ‘वितण्डावाद’?

तर्कों पर कुतर्क हावी, बुद्धि पर कुबुद्धि हावी, दृष्टि पर मतान्धता हावी, विचारों पर अविचार हावी, मान्यताओं पर अस्वीकृति हावी, कर्त्तव्य...
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संपादकीय

हिन्दी के साहित्य समाज की जड़ ‘गोष्ठी परम्परा’

समाज जब जड़ता को धारण करने लग जाए, जब अहम की गठरी का बोझ ढोने लग जाए, जब सर्व हित का रास्ता छपास का आदी हो जाए, जब कलम टकसाल की ओर मुड़ने...
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