Blog
क्या हिन्दी बोलना भारत में अपराध है?

बड़ा अटपटा प्रश्न सामने देखकर हर कोई चौंक जाएगा, हिन्दी भारत की राजभाषा है, और राजभाषा अधिनियम यह कतई नहीं कहता कि आप अन्य भाषा या बोली न बोलो पर राजभाषाओं को बोलना आपराधिक नहीं है। किन्तु इसी भारतीय भूभाग पर हिन्दी बोलने पर 19वर्षीय अर्णव की जान चली जाती है, यह निःसंदेह चिंता का विषय है। आज अर्णव की जान गई है, कल अर्पण पर यह हमला हो सकता है। धीरे-धीरे हर हिन्दीभाषी इसका शिकार हो सकता है। इस ओर सरकारों की अत्यधिक उदासीनता भारत के टुकड़े करने पर आमादा है। हम यह भी जानते हैं कि भारत विविधताओं का देश है, इस राष्ट्र में हर भाषा-बोली, क्षेत्र, जाति और धर्म का सम्मान है। किंतु किसी एक भाषा से इतना द्वेष रखने वाले चंद कुपढ़ लोगों के कारण भारत आक्रान्तित हो और जान लेने पर उतारू हो जाए, यह भारत के संवैधानिक स्वर की हत्या है। मामला मुम्बई के पास कल्याण शहर का है। भाषा को लेकर शुरू हुए एक मामूली विवाद ने 19 वर्षीय कॉलेज छात्र की जान ले ली। आरोप है कि हिन्दी में बोलने की वजह से अर्णव खैरे (19) के साथ मुंबई लोकल ट्रेन में मारपीट की गयी थी। इससे आहत होकर उसने घर में फांसी लगाकर जान दे दी। कल्याण के कोलसेवाडी पुलिस स्टेशन ने मामला दर्ज कर जाँच शुरू कर दी है। हालाँकि घटना बाद भी मामले में किसी की गिरफ़्तारी नहीं हुई है। महाराष्ट्र का एक राजनैतिक दल अपनी मराठी अग्रेसर की नीति के चलते आतंक मचा रहा है, और सरकारें भी मौन होकर यह तमाशा देख रही हैं, जबकि इस तरह सरकारों का मौन सहज पच नहीं रहा। भारतीय भाषाओं के सम्मान को यथावत बनाकर हिन्दी को राष्ट्रभाषा बनाने की माँग का कारण भी कुछ इस तरह की घटनाएँ ही हैं। पहले यही कुकृत्य दक्षिण भारतीय राज्यों में होता था, बैंगलुरू में हिन्दी में लगे दुकान के नामपट्ट के कारण हिन्दी विरोधियों ने दुकानदार पर हमला किया और अंततः उस दुकानदार की जान चली गई, मद्रास, कर्नाटक और बंगाल में हिन्दी बोलने पर जान से मार देने की कई घटनाएँ इस बात की गवाही देती हैं कि लोग लगातार हिन्दी के बहाने भारतीयता पर हमले कर रहे हैं। वे नहीं चाहते कि भारत की आंतरिक अखण्डता मज़बूत रहे और राष्ट्र समग्र रूप से संगठित रहे। ऐसे आंदोलनों पर जो किसी भाषा का विरोध कर बेक़सूर लोगों की जान ले रहे हैं, उन पर केन्द्र सरकार की सख़्ती न होना संदेह उत्पन कर रहा है। जबकि केन्द्रीय गृह मंत्रालय को ऐसी घटनाओं में कड़ी कार्यवाही कर वर्तमान की राजभाषा के संरक्षण का संवैधानिक दायित्व निभाना चाहिए। आज गैर हिन्दी भाषी हथियार उठा रहे हैं, कल हिन्दी का समाज आत्म रक्षा में हथियार उठाएगा, फिर क्या यह देश इसी भाषाई आग में जलेगा और सरकारें तमाशा देखेंगी? राजभाषा अधिनियम में भारतीय राजभाषा के संरक्षण के लिए बने तमाम कानूनी पेंच भी अब हिन्दीभाषियों की हत्याएँ नहीं रोक पा रहे हैं तो फिर उन सभी राजनैतिक दलों पर राष्ट्रद्रोह का दोष लगाने हेतु ‘राष्ट्रभाषा कानून’ बनाने की सख़्त आवश्यकता है। हिन्दी वैसे भी जनगणना के अनुसार सर्वाधिक बोली जाने वाली भाषा है, ऐसे में हिन्दी को राष्ट्रभाषा का कानूनन दर्जा देकर इसके संरक्षण का कार्य केन्द्र सरकार को करना चाहिए, आज हिन्दी के साथ अभागापन हो रहा है, कल तिरंगा जलाया जाएगा, राष्ट्रगान, राष्ट्रीय गीत, राष्ट्र चिह्न, राष्ट्र पशु, राष्ट्र पक्षी सबके साथ यह व्यवहार होगा, तब यह सरकार क्या करेगी? समय रहते भाषा का अमृतकाल आरम्भ होना चाहिए, वरना यह राष्ट्र आंतरिक गृहयुद्ध से घिर जाएगा।
डॉ. अर्पण जैन ’अविचल’*
सम्पादक, मासिक साहित्यग्राम
इंदौर