संपादकीय

बाक़ी है सुनना अभी आज़ादी का मेघ-मल्हार

सावन की रिमझिम फुहारे थीं, दिनभर विभाजन की विभीषिका थी, कहीं मातम पसर रहा था, कहीं लोग आनंदित थे, कहीं गाँधी का विलाप था तो कहीं नेहरू का समझौता, कहीं भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के सैनानियों की बैठकें चल रही थीं, कहीं इस बात पर अंग्रेज़ों से बात चल रही थी कि भारत को आज़ाद किया जाए, इन्हीं सबके बीच भारतीय राजनीति का वह पावन दिन आ गया, जब सावन की फुहारों के बीच मध्य रात्रि में भारत को आज़ाद किया गया।
भारत की महत्ता विश्व भर में स्थापित हुई क्योंकि लगभग दो सौ वर्षों की वैचारिक गुलामी की बेड़ियों को भारतीय स्वाधीनता संग्राम के नायकों के रक्त मिश्रित स्वेद से काटा गया और ‘ब्रिटिश रुल्ड इंडिया’ पर भारत का राष्ट्रध्वज तिरंगा फहराया गया। इस समर के दस्तावेज़ों में भारतीय साहित्य परम्परा का भी महनीय अवदान रहा, लेखकों, कवियों और पत्रकारों ने कलम को अपना हथियार मानकर, जिव्हासन पर विराजित शारदे की कृपा से राष्ट्र जागरण का कार्य किया। कोटिशः भारतीयजनों को राष्ट्रधर्म सिखाया, सोते हुए सिंहों को जगाया, मृतप्रायः पड़ी तरुणाई में राष्ट्र की आज़ादी का मंत्र फूँक कर उस चेतना को राष्ट्र की स्वाधीनता के लिए तैयार किया।
विश्व इतिहास इस बात को स्वीकार भी करता है कि भारतीयों की अपने राष्ट्र को स्वाधीन देखने की जिजीविषा के बलवान होने में भारतीय साहित्यकारों का भी बड़ा योगदान है।
पत्रकारिता का जन्म मध्यकाल और 17वीं शताब्दी में यूरोप में मनोरंजन के लिए हुआ, उसी पत्रकारिता को राष्ट्ररंग में ढाल कर भारतीय स्वाधीनता समर में रक्त मिश्रित लेखनी से भारत के पुनर्जागरण में प्रयोग किया गया।
मुंशी प्रेमचंद की ‘रंगभूमि’, ‘कर्मभूमि’ उपन्यास हो या भारतेंदु हरिश्चंद्र का ‘भारत-दर्शन’ नाटक या जयशंकर प्रसाद का ‘चंद्रगुप्त’ इन सब उपन्यासों ने देशभक्ति जगाई। इसके अलावा वीर सावरकर की ‘1857 का प्रथम स्वाधीनता संग्राम’ हो या फिर लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक की ‘गीता रहस्य’ या शरद बाबू का उपन्यास ‘पथ के दावेदार’ ये सभी किताबें ऐसी हैं, जो लोगों में राष्ट्रप्रेम की भावना जगाने में कारगर साबित हुईं।
’भारत-भारती’ के रचयिता मैथिलीशरण गुप्त ‘राष्ट्रकवि’ कहलाए, तो वहीं माखनलाल चतुर्वेदी ने ‘पुष्प की अभिलाषा’ लिखकर जनमानस में सेनानियों के प्रति सम्मान के भाव जागृत किए। बंकिमचंद्र चटोपाध्याय ने ‘वन्दे मातरम्’ का मंत्र भारत में फूँका तो वहीं सुभद्रा कुमारी चौहान ने ‘झांसी की रानी’ आदि कविताओं के माध्यम से स्वाधीनता आंदोलन को गति देने में अद्वितीय भूमिका निभाई।
इसी क्रम में द्विवेदी युग के साहित्यकारों में महावीर प्रसाद द्विवेदी, श्रीधर पाठक के अलावा कवियों में रामधारी सिंह ‘दिनकर’, गयाप्रसाद शुक्ल ‘स्नेही’, बालकृष्ण शर्मा ‘नवीन’, कवि प्रदीप, शिवमंगल सिंह ‘सुमन’, रामनरेश त्रिपाठी, राधाचरण गोस्वामी, बद्रीनारायण चौधरी ‘प्रेमघन’, राधाकृष्ण दास, माधव प्रसाद शुक्ल, नाथूराम शर्मा शंकर, सियाराम शरण गुप्त, अज्ञेय, प्रताप नारायण मिश्रा, पंडित अंबिका दत्त व्यास, बाबू रामकिशन वर्मा, ठाकुर जगमोहन सिंह आदि ने भारतीय स्वाधीनता प्राप्ति के अश्वमेध यज्ञ में शब्दाहुति देकर आम जन को जागृत किया।
वर्तमान में भारतीय स्वतंत्रता अपने जीवन के 77 बसंत देख चुकी है। भारत की सरकार ने 75 वर्ष पर अमृत महोत्सव मनाकर आज की पीढ़ी को उस समरांगण से परिचित करवाने का काम तो किया परन्तु अब ज़िम्मेदारी अधिक है। न केवल सरकारों पर वरन आम जनमानस पर भी कि हम यह भी चिंताएँ करें कि हमारे स्वाधीनता नायकों ने जिस अप्रतिम भारत के नवनिर्माण की परिकल्पना उस दौर में की थी, हम आज 77 वर्ष बाद उसे कितना साकार कर पाए अथवा आगामी वर्षों में फिर किस तरह का भारत तैयार होगा! जिन वैचारिकी के गठन की परिकल्पना नायकों ने रखी, वह किस हद तक सफल हुई! यह दायित्व अब आज के कलमवीरों पर भी है कि वर्तमान में आज़ादी का मेघ-मल्हार सुनने के लिए लेखकीय परम्परा में कलम को किसकी जय बोलना है अथवा कहाँ पैनापन लाना है! भारतीय जनमानस की ज़िम्मेदारियों को भी तय करवाना होगा, तब तो इस स्वाधीनता के असल रंग भारत देख पाएगा और पुनः विश्वगुरु बनेगा।

डॉ. अर्पण जैन ’अविचल’*

सम्पादक, मासिक साहित्यग्राम
इंदौर

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