संपादकीय

पत्रकारिता और साहित्य से घटता हिन्दी और क्षेत्रीय बोलियों का प्रभाव

भाषाएँ और बोलियाँ भारत की न केवल सांस्कृतिक ध्वजवाहक हैं बल्कि इस राष्ट्र का परिचय भी हैं। यह वही एकात्म के चिंतन की संस्कृति है, जिसने अवधी के राम, ब्रज के कान्हा, राजस्थान से मीरा, बुन्देली से महाराज छत्रसाल, पंजाबी से गुरुनानक देव, सदुकड़ी से कबीर, निमाड़ी से संत सिंगा व बंगाली से स्वामी विवेकानंद और भोजपुरी से भिखारी ठाकुर जैसे महान व्यक्तित्वों को जन्म देकर अपने भाषाई आँगन में बड़ा किया है।
आज राष्ट्र के चिंतन की अवधारणा में भाषाएँ अपना अस्तित्व बचाने के लिए संघर्ष कर रही हैं तो वहीं बोलियों का संघर्ष तो स्वयं को लुप्त होने से बचाने का है। पत्रकारिता और साहित्य के बदलते परिदृश्य में इनका प्रभाव लगातार क्षीण होता दिखाई दे रहा है। यह केवल भाषाई बदलाव नहीं, बल्कि सांस्कृतिक असंतुलन का संकेत है। इसके कारण निश्चित रूप से भारत की वैभव सम्पन्न अखण्डता ख़तरे में आ रही है।
भारत की 2011 की जनगणना के अनुसार, देश में 19,500 से अधिक मातृभाषाएँ/बोलियाँ दर्ज की गईं, जिनमें से लगभग 121 भाषाओं को ही प्रमुख भाषाओं के रूप में मान्यता मिली। हिंदी भले ही देश में सबसे अधिक बोली जाने वाली भाषा है (लगभग 43% आबादी), लेकिन इसके भीतर शामिल सैंकड़ों बोलियाँ-जैसे बुंदेली, मालवी, निमाड़ी, अवधी, ब्रज, भोजपुरी आदि तेज़ी से अपनी स्वतंत्र पहचान खो रही हैं। कई बोलियाँ अब “हिंदी” की छत्रछाया में गिनी जाती हैं, जिससे उनका अलग अस्तित्व आँकड़ों में भी धुंधला पड़ गया है। ऐसे में बोलियों पर संकट अधिक गहरा है। और एक दिन यह बोलियाँ उसी तरह समाप्त हो जाएँगी जैसे अब प्राकृत, पाली, मोड़ी आदि बोली-लिपियों का विलुप्तीकरण हो गया।
इस समय जब समूचा भारतीय मीडिया हिन्दी पत्रकारिता की द्विशताब्दी का उत्सव मना रहा है, ऐसे उत्सवधर्मी दौर में चिंताओं का स्थान भी घट रहा है। समाज अब अपनी बोलियों के लिए, भाषाओं और संस्कृति के लिए अधिक चिंतित होने के स्थान पर ‘स्वयं’ के लिए अधिक परेशान है।
पत्रकारिता में हावी होता बाज़ारवाद और बाज़ार के अनैतिक दबाव के कारण समाज की आवाज़ भी हाशिए पर जा रही है।
भारतीय भाषाओं के समाचार उपभोग पर हुए विभिन्न मीडिया सर्वे यह दर्शाते हैं कि डिजिटल न्यूज़ मंचों पर 60–70% सामग्री में अंग्रेज़ी या ‘हिंग्लिश’ का मिश्रण बढ़ा है। टीवी न्यूज़ चैनलों की भाषा पर किए गए विश्लेषणों में पाया गया कि प्रमुख हिंदी चैनलों में औसतन 25–30% शब्दावली अंग्रेज़ी से प्रभावित है। यहाँ तक कि स्थानीय/क्षेत्रीय अख़बारों की संख्या में वृद्धि के बावजूद, उनकी भाषा में भी “मानकीकृत हिंदी” का दबाव तो बढ़ा है, किन्तु स्थानीय बोलियों का उपयोग घट रहा है। देशज शब्दों का दम तोड़ना निरन्तर जारी है।
इसी तरह के हाल साहित्य जगत् के भी हैं। वहाँ भी प्रकाशन उद्योग के अनुमानों के अनुसार, भारत में प्रकाशित होने वाली नई पुस्तकों में क्षेत्रीय बोलियों में लिखित साहित्य का हिस्सा 10% से भी कम रह गया है। इसके कारण बड़े साहित्यिक पुरस्कारों और मंचों पर चयनित कृतियों में लोकभाषाओं का प्रतिनिधित्व भी लगातार घट रहा है, जबकि शहरी और ‘मानक हिंदी’ का प्रभुत्व बढ़ा है। और तो और विश्वविद्यालयों में हिंदी साहित्य के पाठ्यक्रमों में भी क्षेत्रीय बोलियों का अध्ययन सीमित होता जा रहा है।
पुरखे तो यह कहते रहे कि बड़े पेड़ों के नीचे पैदा होने वाले पौधें कम पनपते हैं। यह हाल बोलियों के साथ भी हो ही रहा है। भाषा का आधुनिकीकरण बहुत आवश्यक है, लेकिन मूल संरचना को नष्ट करके वह आधुनिकीकरण स्वीकार नहीं है।
हिंदी को मज़बूत बनाना है, तो उसकी बोलियों को मुख्यधारा में स्थान देना होगा।
अब पत्रकारिता को भी ‘क्लिक’ नहीं, विश्वास की भाषा अपनानी होगी और साहित्य को ‘बाज़ार’ नहीं बल्कि माटी की गंध को प्राथमिकता देनी होगी। मीडिया संस्थानों को अपनी भाषा नीति बनाना होगी तथा सरकार से अपेक्षा भाषा मंत्रालय की रहेगी। तब इस राष्ट्र की यात्रा परम वैभव तक सहजता से पहुँचेगी।

डॉ. अर्पण जैन ’अविचल’

सम्पादक, मासिक साहित्यग्राम
इंदौर

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