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एआई से संकट में आ गई लेखकीय मौलिकता

चिंतन हो अथवा लेखन, सर्जन हो अथवा निर्माण, दृष्टि हो अथवा दृष्टिकोण, रंग हो अथवा चित्रकारी सब कुछ सदा से मौलिक ही आकर्षित करता आ रहा है। और मौलिक चीज़ों का आनंद किसी आभासी अथवा कृत्रिम से प्रतिस्थापित नहीं किया जा सकता है। फिर भी आज जो घटित होने लग रहा है, वह भयावह तो है ही, साथ में सर्जना पर अघोषित हमला है, जिसकी लपटें एक दिन सर्जना के दीप को रश्मि विहीन कर देंगी। कृत्रिम बुद्धिमता या एआई की आदी हो रही वर्तमान पीढ़ी अपने भविष्य को मौलिकता से वंचित ही न कर दे।
बहरहाल, आज के बच्चे तो छोड़िए बड़े भी अब एआई का सहारा लेने से बाज़ नहीं आ रहे हैं। आजकल के युवा अपनी किसी जिज्ञासा के समाधान के लिए किताबें या इंटरनेट पर उपलब्ध जानकारियाँ नहीं खोजते, बल्कि वो चैट जीपीटी को आदेशित करते हैं कि फला-फलाँ जानकारी उपलब्ध करवाओ। खोज का यह कार्य भी अब चैट जीपीटी के माध्यम से हो रहा है, जो ख़तरनाक है। आप चैट जीपीटी को आदेशित कीजिए कि फलाँ विषय पर फलाँ स्थिति में कविता, आलेख, कहानी, व्यंग्य अथवा कुछ किताब लिख कर दीजिए, विश्वास कीजिए जितनी देर में आप विचार करेंगे, तब तक तो एआई से उस समस्या का समाधान मिल जाएगा। किसी भी विधा में तैयार लेखन मिल जाएगा। कभी-कभी तो कमांड देने के बाद चैट जीपीटी वह समाधान उपलब्ध करवा देता है, जो भाषा की गहरी पकड़ रखने वाला और प्रथम दृष्टया प्रभावी भी दिखेगा।
यह संकट अब धीरे-धीरे गहराता जा रहा है, विद्यार्थी कक्षाओं में सवालों के उत्तर के लिए शिक्षक की प्रतीक्षा नहीं करते, बल्कि सीधे एआई का सहारा लेते हैं। ऐसे दौर में शिक्षक भी कक्षाओं में किताबों से नहीं पढ़ाते, वे भी एआई के आदि होते जा रहे हैं।
ऐसे विपरीत दौर में जब लेखन से अपेक्षा मौलिकता की ही की जा रही हो, तब डर लगने लगता है कि क्या आज जितने मौलिक लोग बच रहे हैं वे अपने भविष्य को मौलिकता सौंप पाएँगे?
प्रकाशकों के पास ऐसी पांडुलिपियाँ भी पहुँच रही हैं जो प्रथम दृष्टया ही नज़र आ जाएँ कि यह चैट जीपीटी का कमाल है। संगीतकार के पास एआई वाले गीत पहुँच रहे हैं, ग्राफ़िक डिज़ाइनर के पास चैट जीपीटी से बनाए चित्र प्रस्तुत हो रहे हैं, ऐसे में निश्चित रूप से विश्वास करना सहज प्रतीत नहीं होता कि जो हमारे हाथ में पढ़ने के लिए किताब या कविता आई है, वह मौलिक है भी या नहीं। ऐसे विकट दौर में भविष्य भी अंदेशे से भरा दिखा रहा है, जहाँ लेखकीय मौलिकता पर संकट गहराता जा रहा है। इस हेतु वर्तमान पीढ़ी को भी प्रबंध करना होगा, वैकल्पिक सरल रास्ते पर चलने के कुछ फ़ायदे हैं तो अधिक नुक़सान भी हैं।
इस संकट से बचना है तो मौलिकता पर आए इस ख़तरे के कालखंड में सभी को समवेत स्वर में मौलिकता बचाने की दिशा में काम करना होगा, जितना लिखेंगे मौलिक लिखेंगे। आज कई लेखक इस बात से चिंतित हैं कि उनकी रचनात्मकता, कौशल और कड़ी मेहनत से रची गई रचना को उनकी सहमति के बिना जनरेटिव एआई एल्गोरिदम को प्रशिक्षित करने के काम को टाटा कहना होगा। कृत्रिम बुद्धिमत्ता का मूल विचार मानव बुद्धि की नकल करना है, लेकिन मशीन स्तर पर। आज यह दुविधा भविष्य का लेखकीय मौलिकता विहीन समाज की कल्पना मात्र से ही खड़ी हो जाती है, ऐसे में मौलिकता का बचना अत्यंत अनिवार्य है और इसके लिए देशभर को एकजुट होकर आंदोलन करना ही होगा।
डॉ. अर्पण जैन ’अविचल’
सम्पादक, मासिक साहित्यग्राम
इंदौर