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पुस्तक संस्कृति से बचेगी भारतीय संस्कृति और भाषाएँ

भारत की संस्कृति सदा से ही ग्रन्थ और पुस्तकों के अनुशासन से समृद्ध श्रुति-स्मृति परम्परा की संस्कृति है। वेद, उपनिषद्, पुराण, बौद्ध त्रिपिटक, जैन आगम, संत-साहित्य, भक्ति-सूफ़ी परम्परा ये सब पुस्तक-केन्द्रित चेतना के उदाहरण हैं। शास्त्र और ग्रन्थ-साहित्य से ही अब तक धर्म, संस्कृति, गाँव, लोक, परम्पराएँ, समाज, जीवन, मनुष्य, मनुष्यताएँ, भावनाएँ, संवेदनाएँ, और सजीवता शेष बच पाई हैं। जब तक ग्रन्थ रहे, तब तक भाषा जीवित रही, और जब भाषा जीवित रही, तब तक संस्कृति साँस लेती रही।
भारतीय ज्ञान परम्परा ने सदा से पुस्तकों को अग्रणीय रखा है और भारतीयता की नींव का आधार ग्रन्थ, साहित्य और समाज जागरण का कार्य करने वाले लोग ही हैं, इसी कारण भारत विश्व गुरु कहलाता रहा है। शनै-शनै पुस्तक पढ़ने वाली प्रजाति भारत से विलुप्त होने लगी, जिसका दुष्परिणाम हमारे सामने है कि वर्तमान पीढ़ी संस्कारों की मज़बूत रीढ़ को कमज़ोर कर बैठी है।
वर्ष 2026 में कर्नाटक के मांड्या जिले में हरलहल्ली गाँव के रहने वाले एक पूर्व बस कंडक्टर एन्के गौड़ा ने वर्षों की लगन से सबसे बड़ा निजी पुस्तकालय ‘पुस्तक माने’ बनाया है, जिसमें 20 लाख से अधिक किताबें हैं और इसके लिए उनको इस साल पद्मश्री देने की घोषणा भी की गई है।
77 साल के एन्के गौड़ा ने सीमित संसाधनों के बावजूद किताबों के प्रति अपने प्रेम और जुनून से यह पुस्तकालय बनाया है। इसकी गिनती देश की सबसे बड़ी निजी लाइब्रेरियों में होती है।
इस तरह का प्रेम इंदौर में भी राधेश्याम माहेश्वरी ने दिखाया है, उन्होंने अपनी निजी बचत ख़र्च करके साकेत नगर क्षेत्र में ‘आत्म अनुभूति मंच’ स्थापित किया, जिसमें 24 घण्टे खुले रहने वाले पुस्तकालय का निर्माण किया, जहाँ हज़ारों किताबें है, और बड़ी बात यह है कि इस पुस्तकालय से कोई भी, कभी भी किताबें ले जा सकता है और पढ़कर वापस लौटा सकता है। मज़ेदार बात यह भी है कि यहाँ किताबें ले जाने और लौटाने वाले के लिए कोई रजिस्टर नहीं होता।
मातृभाषा उन्नयन संस्थान द्वारा भी ’घर-घर पुस्तकालय’ अभियान संचालित किया जा रहा है। राष्ट्रीय सचिव भावना शर्मा के नेतृत्व में जारी इस अभियान के माध्यम से 10000 से अधिक निजी पुस्तकालय घर-दुकान एवं कार्यालयों में तैयार हो गए। इस तरह देश में कई प्रयास हो रहे हैं, जो पुस्तक संस्कृति को बचाने के लिए कार्यरत हैं।
पुस्तक अपने साथ समय को रेखांकित करती है, हमारे पुरातन ग्रन्थों में भी कहानियों और घटनाओं के साथ उस कालखण्ड के समाज को दर्ज किया है। रामायण में राम का युग वर्णित है, रावण की लंका का व्यवहार दर्शाया गया है। इसी तरह महाभारत में कृष्ण काल को बताया गया है। कुरान, बाइबल इत्यादि भी धार्मिक कथाओं के इतर उस देश, काल और परिस्थितियों को रेखांकित करती है।
पुस्तकें ज्ञान का उपनिवेशीकरण तोड़ती हैं। इसी कारण यह किसी राष्ट्र की सर्वोच्च पूँजी भी मानी जाती हैं। भारत में 1900 से अधिक भाषाएँ-बोलियाँ दर्ज हैं। यूनेस्को के अनुसार, इनमें से क़रीब 200 भाषाएँ संकटग्रस्त हैं। इसका मुख्य कारण जिन भाषाओं में लिखित साहित्य और पुस्तकें नहीं रहीं, वे सबसे पहले समाप्त हो रही हैं। अब यदि हमारे देश में पुस्तक संस्कृति नहीं बचाई गई तो भारतीयता के सुखद भविष्य पर संकट छा जाएगा। कहते हैं भाषा वही बची है, जो लिखी गई है, और संस्कृति वही बची है, जो पुस्तकों में सुरक्षित रही है।
डॉ. अर्पण जैन ’अविचल’
सम्पादक, मासिक साहित्यग्राम
इंदौर