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साहित्य से ग़ायब हो रहा ‘ऐतिहासिक लेखन’

न गाँव बच रहे न लोक, न इमारतों का ज़िक्र है न लोगों का, न मनुष्य बच रहे न मनुष्यता, न तथ्य है न तारतम्यता, न खोज है न खोजी प्रवृत्ति, न सारगर्भित तर्क है न ही तर्क जानने की चेष्टा। अब साहित्य में केवल छपना ही शेष रह रहा है। यह स्थिति किसी अन्य देश की नहीं बल्कि भारतीय साहित्य की हो रही है, जहाँ सुबह लिखकर शाम तक छपने की जुगत जमाने वाली खरपतवारों ने मौसमी फसलों का रूप ले लिया है। जो गाहे-ब-गाहे भारतीय साहित्य की वर्तमान स्थिति को लेकर स्वाभाविक चिंता पैदा कर रही है।
विगत एक दशक से भारतीय साहित्य से लगातार ऐतिहासिक पृष्ठभूमि का लेखन कम से कमतर होता जा रहा है, ऐतिहासिक उपन्यासों की संख्या नदारद हो रही है, आलेखों की संख्या दिन-प्रतिदिन गिर रही है। इसका दुष्परिणाम यह भी होने लगा है कि दस्तावेज़ों के नाम पर व्हाट्सएप्प पर चलने वाले अपुष्ट संदेशों को ही सर्वमान्य घोषित कर मानक बनाया जाने लगा है, जबकि साहित्यकारों के तर्क और पुस्तकों में प्रकाशित लेखन भी मानक या संदर्भ के रूप में शामिल नहीं होते हैं। इसके पीछे का बड़ा कारण साहित्य से विलुप्त होती खोजी और अन्वेषणकारक प्रवृत्ति का ग़ायब होना भी है।
खोज किसी भी विधा की विश्वसनीयता का मानक बिंदु है, यदि किसी स्थान, गाँव, मठ, मन्दिर या अन्य जगहों की ऐतिहासिकता का प्रमाणीकरण माँगा जाता है तो सबसे पहले उस स्थान विशेष के बारे में भारतीय ग्रंथों में वर्णित या लिखित तथ्यों को आधार बनाया जाता रहा है, पुरातात्विक विभाग के सर्वे रपट का भी आधार भारतीय ग्रंथ माने जाते हैं क्योंकि उन ग्रंथों, किताबों में दर्ज सामग्री के वृहद् प्रमाण होते रहे हैं किन्तु वर्तमान इन सबसे लगातार दूर होता जा रहा है।
वैविध्य की साधना में साहित्यिक वैधव्य आमंत्रित हो गया, जबकि इस वैधव्य से साहित्य के अप्रासंगिक बने रहने का ख़तरा भी कम नहीं है। भारतीय ज्ञान परम्परा में सदा से ही खोज की फलश्रुति को मानक माना परन्तु अब के साहित्यकारों में अन्वेषण की प्रवृत्ति का ही समूल ह्रास हो रहा है।
जानकारी का एकत्रीकरण, संरक्षण और परीक्षण अब देखने में कम आ रहा है, इसी कारण ‘व्हाट्सएप्प विश्वविद्यालय’ जैसी अवधारणा, जो अधिकांश ग़लत तथ्यों को परोसने में अव्वल हो रही है।
एक समय वृंदावनलाल वर्मा, किशोरीलाल गोस्वामी, अमृतलाल नागर, जयशंकर प्रसाद, रांगेय राघव, नरेंद्र कोहली और फिर शरद पगारे जैसे महत्त्वपूर्ण व्यक्तित्व के धनी साहित्यकारों ने ऐतिहासिक पात्रों पर खोजपूर्वक लिखा और वह अमरता प्राप्त कर गया जबकि नए दौर में यह कम दिखाई दे रहा है।
उपन्यासों के अलावा आलेख, कहानी, जीवनी, निबंध, कविताओं के माध्यम से भी रचनाकार अपने भीतर के अन्वेषी साधक को जीवित रख सकते हैं। और यदि यह खोजी प्रवृत्ति नहीं बची तो भारतीय साहित्य अपनी विश्वसनीयता धीरे-धीरे खो देगा, एक समय ऐसा आएगा कि फिर इस साहित्य को ही लुगदी मानकर कूड़े के हवाले कर दिया जाएगा, और दोष यह दिया जाएगा कि कुछ पढ़ा नहीं जाता, जबकि हक़ीक़त यह भी है अच्छा लिखा नहीं जा रहा इसलिए पढ़ा नहीं जा रहा, जो अच्छा लिख रहा वह ख़ूब पढ़ा भी जा रहा है।
डॉ. अर्पण जैन ’अविचल’
सम्पादक, मासिक साहित्यग्राम
इंदौर