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भारतीय वाङ्मय में प्रस्फुटित होता बसंत

ऋतुराज बसन्त का आगमन और फिर न केवल प्रकृति प्रदत्त मौसम बासंती होता है बल्कि उस दौरान रची-गढ़ी जाने वाली रचनाएँ भी बासंती रंग में पीली हो जाती हैं यानी प्रेमिल ध्वनियों से उत्पन्न साहित्यिक प्रतिध्वनियों में भी प्रेम सहज बरसता है। बसंत के आगमन का माह फ़रवरी न केवल बसन्त बल्कि साहित्यिक दृष्टिकोण से मातृभाषा दिवस की उपस्थिति का मास भी है और ‘शिवोऽहम्’ की अनुगूँज के साथ शिवरात्रि का भी भान करवाता है।
वैसे भी प्रशान्त महासागर की तरह गहरी भारतीय संस्कृति में जो वाङ्मय है, वही सर्वेश है, यानी समाज पर ग्रंथ, परम्पराओं और ईश सत्ता का भान करवाती पुस्तकों के रचयिताओं का नियंत्रण है।
देहरी पर रखे दीप की भांति भारतीय समाज प्रज्वलन करता है और उसमें ईधन रूपी साहित्य समष्टि की यात्रा का कारक बनता है।
भारतीय कविता में बसन्त ऋतु का वर्णन बहुत ही सुंदर और प्रेमिल तरीक़े से किया गया है। कवियों ने बसन्त को प्रकृति की सुंदरता और जीवन की नवीनता का प्रतीक बताया है। जैसे महाकवि कलिदास की कविता “मेघदूत” में बसन्त ऋतु का वर्णन बहुत ही सुंदर तरीक़े से किया गया है। सूरदास की कविताओं में बसन्त ऋतु का वर्णन कृष्ण और राधा के प्रेम के संदर्भ में किया गया है। मीराबाई की कविताओं में बसन्त ऋतु का वर्णन भगवान कृष्ण के प्रेम के संदर्भ में किया गया है। आधुनिक कविताओं में देखें तो भारतीय कविताओं में बसंत ऋतु को लेकर कई कविताओं को लिखा गया है। बसंत ऋतु को लेकर लिखी गई कुछ कविताएँ रामधारी सिंह ‘दिनकर’, बसंत – मक्की, वसंत ऋतु – मैथिली शरण गुप्त, बसंत और हम – हरिवंश राय बच्चन, हे वसंत क्यों तू आता है – जयशंकर प्रसाद। इनके अतिरिक्त बाबा नागार्जुन, निराला, पंत, केदारनाथ अग्रवाल ने भी बसंत ऋतु को लेकर कुछ और कविताएँ लिखी हैं।
बसंत के साथ एक विरोधाभास पंडित विद्यानिवास मिश्र ने अपने निबंध संग्रह ‘बसन्त आ गया पर कोई उत्कण्ठा नहीं’ में दर्शाया है। यह संग्रह पण्डित जी ने राममनोहर लोहिया जी को समर्पित किया था और इसकी भूमिका में पंडित जी लिखते हैं कि ‘पता नहीं डॉ. लोहिया होते तो अपने को कितने अकेले पाते और कितना आज की परिस्थिति में राजनीति के लिए संकल्प शक्ति कार्यान्वित कर पाते। मैं नहीं मानता कि जो कुछ उन्होंने कहा वह व्यर्थ गया। व्यर्थ जाने लायक उन्होंने कुछ किया ही नहीं, पर उसकी अर्थ कहीं ऐसी अन्धी गुफ़ा में ढकेल दिया गया है, जहाँ से वह निकलने के लिए छटपटा रहा है। बसन्त उपलक्षण है, ऐसी सिसृक्षा का जो अपने को निःस्व बनाने का जोखिम उठाती है और जो रचती है उसमें स्वयं को विलीन करने का उल्लसित भाव रखती है। इसी रूप में बसन्त वेधक भी है और मोहक भी। मैं उसी बसन्त का आह्वान करना चाहता हूँ। एक निःस्व हो रहे देश में और निःस्वता की कीमत अदा कर असली स्व को पहचानने के लिए छटपटा रहे देश में।’
भारतीय उपन्यास में भी बसन्त ऋतु का वर्णन बहुत ही विस्तृत और मनहर तरीक़े से किया गया है। उपन्यासकारों ने बसन्त को प्रकृति की सुंदरता और जीवन की नवीनता का प्रतीक बताया है। जैसे प्रेमचंद के उपन्यास “गोदान” में बसन्त ऋतु का वर्णन बहुत ही सुंदर तरीक़े से किया गया है। शरतचंद्र चटर्जी के उपन्यास “देवदास” में बसन्त ऋतु का वर्णन है।
इसी के साथ भारतीय नाटकों में भी बसन्त का सुव्यवस्थित वर्णन है। भारतेंदु हरिश्चंद्र के नाटक “अंधेर नगरी” में, जयशंकर प्रसाद के नाटक ‘ध्रुवस्वामिनी’ में बसन्त ऋतु का वर्णन है।
नाटकों, निबंधों, उपन्यासों के अलावा कहानियों और अन्य विधाओं में भी बसंत ऋतु को भरपूर स्थान मिला है।
भारत की समृद्ध साहित्यिक परम्पराओं ने बासंती ताना-बाना बुना है, जो वर्तमान तक क़ायम है। भारतीय वाङ्गमय इसीलिए दुनिया के समस्त साहित्यिक दृष्टिकोण से अधिक सम्पन्न है क्योंकि यहाँ राष्ट्रधर्म को प्रथम रखते हुए सभी विषयों का समावेश किया गया। इसीलिए भारतीयता ज़िंदाबाद थी, ज़िंदाबाद है और सदा सनातन तक ज़िंदाबाद रहेगी।
डॉ. अर्पण जैन ’अविचल’
सम्पादक, मासिक साहित्यग्राम
इंदौर