संपादकीय

छद्म नारीवाद की भेंट चढ़ता आधुनिक स्त्री विमर्श

वो मोमबत्ती लेकर तो निकली पर असल गुनहगार गायब हो गए, वो नारीवाद और स्त्री स्वच्छन्दता के नाम पर नग्नता को अपनाने लग गई, वो चीख़ने तब लगी जब किसी ख़ास से मनमुटाव हो गया, पाबन्दी तब लगने लगी जब रात-रात भर डिस्को-बार में जाने से परिवार रोकने लगा, आज़ादी पर हमला तब महसूस होने लगा जब बेरोकटोक घूमना सहज लगकर समाज पराया लगने लगा और न जाने तमाम-तमाम कारणों के कारण आज की स्त्री आधुनिकता के नाम पर नग्नता की भेंट चढ़ रही है। महिला सशक्तिकरण और सक्षमीकरण अत्यंत आवश्यक है परन्तु स्त्री की आज़ादी के नाम पर नग्नता परोसना, अनैतिक गतिविधियों में संलिप्त होना, परिवार-समाज की मर्यादाओं का गला घोंटना, सस्ती लोकप्रियता पाने के लिए नग्न हो जाना, भारतीयता पर लगातार हमले करना, दहलीज़ लाँघ कर हवस और नशे की शिकार हो जाना, यह कौन सा स्त्री का आधुनिक रूप है?
स्त्री जाति में परमपूजनीय शब्द माँ है और इसी शब्द से सृष्टि की पहली सर्जना परिभाषित होती है, मातृभूमि से जन्मदात्री परिवेश के प्रति मातृत्व भाव प्रदर्शित होता है और मातृशक्ति से शक्ति के समग्र विकास की यात्रा का प्रदर्शन होता है। इन तीन शब्दों में समग्र समाज और इसके जीवन की सम्पूर्ण परिकल्पना को समाहित किया जा सकता है।
ऐसे रिश्तों को अपनाना आजकल की छद्म स्त्रीवादियों को बंधन लगने लगा, पुरुषों से प्रजनन की उम्मीद करके लिंग परिवर्तन को विवश करने वाली वह लड़कियाँ स्त्रीवाद का सबसे कुरूप चेहरा है।
भारत में बीते दिनों स्त्री स्वच्छन्दता के नाम पर फूहड़ता परोसना फ़ैशन का हिस्सा हो चुका है। जबकि भारतीय ज्ञान परम्परा में माँ, मातृभाषा, मातृभूमि का महनीय महत्त्व परिभाषित किया गया है। वेदों-उपनिषदों से आरम्भ इस ज्ञान परम्परा में स्त्री को पूजनीय और निज भाषा को सब उन्नति का मूल भी बताया है। मनुस्मृति के तृतीय अध्याय में वर्णित श्लोक में स्पष्ट है कि ‘यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः’ उसी तरह वाल्मीकि रामायण की पाण्डुलिपियों में उल्लेखित है कि ‘जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी।’ वही आधुनिक युग के महनीय कवि भारतेंदु हरिश्चंद्र की कविता निज भाषा में लिखा है कि ‘निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल।’
इस अवधारणा के मूल को समझते हुए भारतीय मेधा को अपने जीवन में माँ, मातृभाषा, मातृभूमि और मातृशक्ति के सम्मान का यथोचित ध्यान रखना भी चाहिए और उसके प्रति कर्त्तव्यों का निर्वहन भी करना चाहिए। परंतु इस समय जेएनयू जैसे प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय में स्त्री स्वच्छन्दता के नाम पर जो नंगा नाच हो रहा है, वह जग ज़ाहिर है।
बीते दिनों लीना मणिमेकलाई अपनी डाक्यूमेंट्री फ़िल्म ‘काली’ के पोस्टर को लेकर चर्चा में रहीं। वे ख़ुद को डाक्यूमेंट्री फ़िल्म निर्माता के साथ प्रबल नारीवादी भी बताती हैं। उनके लिए देवी काली का धूम्रपान करना महिला सशक्तीकरण का पर्याय है। उन्हीं जैसी नारीवादी छवि वाली नेता महुआ मोइत्रा हैं, जिन्होंने ‘काली’ के पोस्टर का समर्थन किया है। इसके पहले एक और कथित नारीवादी महिला क्षमा बिंदु चर्चा में थीं, क्योंकि उन्होंने ख़ुद से शादी की थी। कई समाचार पत्रों ने ‘नारी-मुक्ति’, ‘महिला-सशक्तीकरण’, ‘पितृसत्तात्मक-व्यवस्था के मुँह पर तमाचा’ जैसी उपमाओं से क्षमा बिंदु को महिमामंडित भी किया था। इस तरह के भद्दे तर्कों से नारीवाद परिभाषित करना कहाँ तक न्यायसंगत है? इन घटनाओं में स्त्री के समानता के अधिकार इत्यादि के लिए चलाए असल नारीवादी आंदोलन की भूमिकाओं को ध्वस्त कर बाज़ार आधारित नारीवाद को जन्म दिया है। इसके अंतर्गत नग्नता, पोल डांस से लेकर नग्न सेल्फी, सिगरेट और शराब पीने को महिला सशक्तिकरण का पर्याय मान लिया गया है। सशक्तिकरण के इस छद्म रूप की आवाज़ इतनी मुखर है कि उन तमाम महिलाओं के स्वर दब गए हैं, जिन्होंने दशकों से पीड़ा और असमानता के दंश झेले हैं।
हेडली के अनुसार, इसके तहत किसी धनाढ्य, चर्चित या प्रतिष्ठित महिला का धारा से विपरीत कुछ अलग या सनसनीखेज़ करना ही सशक्तिकरण है। अमेरिकी मॉडल किम कार्दशियन का टापलेस सेल्फी ट्वीट करते हुए यह दावा करना इस तथ्य की पुष्टि करता है कि वह अपनी कामुकता से सशक्त हो रही हैं और यह दुनिया भर में लड़कियों और महिलाओं के सशक्तिकरण को प्रोत्साहित करने का उनका प्रयास है। उदार नारीवाद की पैरोकार बनीं किम कार्दशियन के इस दर्शन का अगर कोई विरोध करता है तो उसे एक पुराने हारे हुए व्यक्ति के रूप में बताया जाता है, जिसने बॉडी शेमिंग (शारीरिक संरचना का मज़ाक उड़ाना) को प्रोत्साहित किया। अब इससे तो सीधे तौर पर भारतीयता पर हमला किया जा रहा है। हर देश का अपना कानून है, हर समाज की अपनी मर्यादाएँ, ऐसे समय हर मर्यादा के विरुद्ध आचरण करके उसे आधुनिकता का नाम भर दे देना उचित भी नहीं।
अब ‘फ्री द निप्पल कैंपेन’ को भी नारीवादी स्वतंत्रता का सशक्त माध्यम माना जाता है। इस बारे में नाओमी स्काफोर खिन्न होकर लिखती हैं, ‘संयुक्त राष्ट्र की सद्भावना दूत एम्मा वाटसन जिस मुहिम (फ्री द निप्पल) को आप महिला सशक्तिकरण मान रही हैं, उस पर अगली बार यूएन सद्भावना दूत बनकर भाषण दें, इसे प्रयोग में लाकर देखें और यह पता करें कि कितने लोग आपकी बातों को गंभीरता से लेते हैं?’

जबकि फेमिनिज़्म फ़ॉर विमेन: द रियल रूट टू लिबरेशन’ पुस्तक की लेखिका जूली का कहना है कि महिलाओं की नग्न छवियाँ नारीवाद की अभिव्यक्ति नहीं हो सकतीं।
यह चिंता का विषय है कि वर्षों पूर्व जिस नारीवाद आंदोलन का आरंभ पितृसत्तात्मक व्यवस्था के खात्मे के लिए हुआ था, वह आज उन्मुक्तता और स्वच्छंदता में अपनी राह तलाश रहा है और व्यक्ति विशेष की स्वतंत्रता एवं उन्नति को नारीवाद की सफलता के रूप में प्रस्तुत करने में लगा हुआ है।
ऐसे दौर में स्त्री चरित्र को तार-तार करने वाली शक्तियाँ भी सक्रिय होकर इस ‘स्यूडो फेमिनिज़्म’ या छद्म नारीवाद की आड़ में भारतीय संस्कृति के साथ खिलवाड़ किया जा रहा है, जो सहनीय भी नहीं।
मूलतः नारीवाद सभी स्त्रियों की समानता और मुक्ति के लिए एक आवश्यक सामाजिक आंदोलन है, न कि केवल नग्नता, सार्वजनिक फूहड़ता और नशाखोरी नारीवाद का अंग।
इस समय स्त्री तो पुरुष के बराबरी का स्थान अधिक अर्जित कर रही है, भारतीय सांस्कृतिक ताने-बाने में सनातन काल से शिव ने शक्ति को अपने समकक्ष स्थान देकर अर्धनारीश्वर रूप धरकर यह संदेश दे दिया कि स्त्री और पुरुष बराबर हैं। कोई भेद नहीं, किन्तु वर्तमान में उसी सनातन मान्यताओं को ध्वस्त करने का कार्य करना भी न्यायोचित नहीं है। इस तरह की चर्चाओं को भी समाज में सहज स्वीकृति नहीं मिलनी चाहिए।
समाज में स्त्री स्वच्छन्दता के नाम पर परोसी नग्नता का भी विरोध होना चाहिए तो साथ-साथ पुरुष सत्ता की स्थापना पर भी मौन नहीं होना चाहिए।
निरंकुशता हमेशा ही घातक रही है। अंकुश समाज का होगा तो सफलता संभव है, अन्यथा समाज गर्त में चला जाएगा।

डॉ. अर्पण जैन ’अविचल’

सम्पादक, मासिक साहित्यग्राम
इंदौर

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