संपादकीय

साहित्य से ग़ायब हो रहा ‘ऐतिहासिक लेखन’

न गाँव बच रहे न लोक, न इमारतों का ज़िक्र है न लोगों का, न मनुष्य बच रहे न मनुष्यता, न तथ्य है न तारतम्यता, न खोज है न खोजी प्रवृत्ति, न ...
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संपादकीय

बाक़ी है सुनना अभी आज़ादी का मेघ-मल्हार

सावन की रिमझिम फुहारे थीं, दिनभर विभाजन की विभीषिका थी, कहीं मातम पसर रहा था, कहीं लोग आनंदित थे, कहीं गाँधी का विलाप था तो कहीं नेहरू ...
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संपादकीय

क्या हिन्दी बोलना भारत में अपराध है?

बड़ा अटपटा प्रश्न सामने देखकर हर कोई चौंक जाएगा, हिन्दी भारत की राजभाषा है, और राजभाषा अधिनियम यह कतई नहीं कहता कि आप अन्य भाषा या बोली ...
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संपादकीय

विश्व में भारतीयता का अनुशासन ‘हिन्दी’

भारत भारती का जयघोष हर दिशा में हो रहा है, बंकिम बाबू द्वारा लिखित और भारतीय संविधान में वर्णित राष्ट्रीय गीत वन्देमातरम् अपने 150 वर्ष...
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