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बुद्धिजीवी साहित्यकारों पर क्यों हावी ‘वितण्डावाद’?

तर्कों पर कुतर्क हावी, बुद्धि पर कुबुद्धि हावी, दृष्टि पर मतान्धता हावी, विचारों पर अविचार हावी, मान्यताओं पर अस्वीकृति हावी, कर्त्तव्य पर अधिकार हावी, मौलिकता पर प्रतिलिपि हावी, और तो और अभिव्यक्ति पर अव्ययक्ति हावी होती ही जा रही है। ऐसे कालखण्ड में भारतीय साहित्य की अवनति परिलक्षित होने लगी है।
एक ओर प्रगतिशीलता के नाम पर मान्यताओं का खुलकर विरोध सामने है तो राष्ट्रवाद के साथ अमानवीयता का सम्मिश्रण होने लग गया है।
समय जब भी इस काल खंड को वैश्विक आलोक में लिखेगा, भारतीय साहित्य और साहित्यकार पिछले पायदान पर नज़र आएँगे।
आख़िर बुद्ध और महावीर के देश में यह किस तरह की परिभाषाओं ने जगह बना ली! यह बुद्धिजीवियों के लिए विचारणीय है।
भारतीय साहित्य के इतिहास में तर्क और प्रमाण के सहारे होने वाले विमर्शों की वृहद् परम्परा रही है, इसके ऐतिहासिक गर्भ में दृष्टि डालने पर हम शंकराचार्य और मण्डन मिश्र जैसे गुणीजनों का वर्णन भी देखते हैं। किन्तु तर्क और विमर्श के नाम पर वर्तमान में केवल वितण्डावाद का स्थान ही देख रहे हैं जो कि किसी भी दृष्टिकोण से सही नहीं है।
अक्षपाद द्वारा दिए न्याय-सूत्र के सिद्धांत के अनुसार चर्चा की सोलह श्रेणियों में से एक वितण्डावाद है। सोलह पदार्थ बौद्धिक विश्लेषण की एक विधि का प्रतिनिधित्व करते हैं और जानने योग्य और नाम देने योग्य हर चीज़ को वर्गीकृत करते हैं।
भारतीय दर्शन में वात्स्यायन द्वारा वर्णित वितण्डा (वितण्डा, “बहस”) गौतम के न्यायसूत्र (दूसरी शताब्दी ई.) के पहले अध्याय में सोलह पदार्थों (“श्रेणियों”) में से बारहवें को संदर्भित करता है। मूल्यहीन तर्क को वितण्डा के रूप में जाना जाता है। इसे एक प्रकार का वाद-विवाद भी कहा जाता है, जिसमें विरोधी अपना मत स्थापित करने का प्रयास नहीं करता बल्कि केवल प्रतिपादक के दृष्टिकोण का खंडन करने का प्रयास करता है। इस वितण्डा में प्रत्येक पक्ष प्रतिपादक या विरोधी दूसरे के मत का खंडन करके जीतने का प्रयास करता है।
इस आक्रमणकारी सूत्र की समझ 21वीं सदी के भारतीय बौद्धिकसमाज में अधिक दिखने लगी है, क्योंकि यहाँ तर्क की नहीं बल्कि विजय होने की लालसा का बहुतायात में होना भी है।
वर्तमान का बौद्धिक समाज अपनी बौद्धिक कुदाली की धार न करके व्हाट्सएप से प्राप्त जानकारियों के माध्यम से तर्क स्थापना की दिशा में प्रयास कर रहा है, जो कि साहित्यिक दृष्टिकोण से भी और सामाजिक दृष्टिकोण से भी हानिकारक है। हम उस देश के वासी हैं, जहाँ साहित्यकारों को आमजन से अलग यानी अधिक बुद्धिमान माना जाता रहा है, और उस बौद्धिक समाज में सहज उठना-बैठना तब तक कतई सम्भव नहीं जब तक आपकी बौद्धिकता प्रामाणिक न हो। किन्तु लिखने और छपने की होड़ ने बौद्धिक परिवार को कुण्ठित और कुंद कर दिया है।
ऐसे दौर में नित-प्रतिदिन साहित्य और विमर्शों का ह्रास हो रहा है। साहित्यकार कलम का श्रमिक होता है, यदि वह भी वितण्डा के सहारे इमारत बुनने लगेगा तो सफलता कैसे मिलेगी? लिखना और छपना एक अलग प्रक्रिया है, किन्तु इस प्रक्रिया में बौद्धिकता का दर्शन होना एक अलग प्रकार की चेष्टा है।
अधिकांश भारतीय साहित्यकार इस समय केवल लिखने और छपने को ही अपना ध्येय मान कर जीवनयापन कर रहे हैं किन्तु इन सबके बीच से विमर्श और शास्त्रार्थ की परम्परा अपने परमधाम चली गई और यह समाज खोखला ही नज़र आने लग गया।
समाज में बुद्धि के स्तर में अचानक आई कमी ने कुतर्की दृष्टिकोण को बलवान कर दिया, साहित्य समाज ने इसे भी सहज रूप से स्वीकार कर लिया और अब कुतर्कों के सहारे बहस करने की प्रवृत्ति निरंकुश होते हुए समाज को प्रभावित करने लग गई, यह न्यायोचित भी नहीं और साहित्य के भविष्य के लिए भी ठीक नहीं हैं। तर्क को पुष्ट करने के लिए शास्त्रों का सहारा लेना आम प्रक्रिया है, किन्तु अब नवबौद्धिक (तथाकथित) समाज केवल इंटरनेट की सामग्री के भरोसे कुतर्की होता जा रहा है, आने वाली पीढ़ियों की ग्रंथालयों से आंशिक दूरी एक नए समाज का निर्माण करने में जुट गई है, जिसे वर्तमान दौर में ‘व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी’ का अध्ययन कहा जाता है। ऐसे असंवेदनशील बौद्धिक समाज से राष्ट्र और चिन्तनशील समाज का भला कैसे हो सकता है? यह विचारणीय है।
असल मायने में कुतर्क के सहारे होने वाले वाद-विवाद में हासिल शून्य ही रहता है और हमेशा शून्य ही रहेगा। अब भारतीय समाज को पुनः अपनी जड़ों की ओर लौटना चाहिए, जिन जड़ों में चिंतन, मनन, तर्क, संवेदनशीलता और सामाजिक दृष्टिसम्पन्नता स्थापित है। अन्यथा आने वाली पीढ़ी जिस नए समाज का दृश्य देखेगी, स्वयं के साथ-साथ अपने पुरखों को भी कोसेगी।
डॉ. अर्पण जैन ’अविचल’
सम्पादक, मासिक साहित्यग्राम
इंदौर