संपादकीय

हिन्दी के साहित्य समाज की जड़ ‘गोष्ठी परम्परा’

समाज जब जड़ता को धारण करने लग जाए, जब अहम की गठरी का बोझ ढोने लग जाए, जब सर्व हित का रास्ता छपास का आदी हो जाए, जब कलम टकसाल की ओर मुड़ने लग जाए, जब सीखने के सभी किवाड़ बंद कर दिए जाएँ, अभ्यास से हीनता नज़र आने लगे, और जब स्वयंभू गुरुत्व स्थापित हो जाएं तो निश्चित रूप से प्रगति के सभी द्वार बंद मिलते हैं और उन्नत होने के अवसर समाप्त होते दिखते हैं, इसके साथ समाज की सफलता नहीं होती बल्कि अवनति के आमंत्रण आने लग जाते हैं।
कुछ ऐसा ही हाल वर्तमान में हिन्दी साहित्य समाज के साथ लगातार हो रहा है। आज का साहित्यकार सीखने की परंपरा को दरकिनार कर ‘स्थापित’ व ‘वरिष्ठ’ श्रेणी में रहने पर आमादा है। 21वीं सदी का समकाल निरंतरता के नहीं बल्कि ‘छपास’ के मार्ग पर चल रहा है। इस काल में लेखक वह माना जा रहा है जिसे सुबह उठते ही विचार आता है, नाश्ते की प्लेट सजने तक उस विचार पर 10-15 पंक्तियाँ लिखता है, दोपहर के भोजन तक उसे मित्र-मण्डली के अलावा अख़बारों और पत्र-पत्रिकाओं, पोर्टल इत्यादि में भेजता है, शाम के भोजन तक रचना के छपने की सूचना का प्रकाशन करता है और अगले दिन सुबह तक उस रचना पर पुरस्कार या डिजिटल प्रशंसापत्र को सोशल मीडिया पर पोस्ट करके वाह-वाही की प्रतीक्षा करता है, कुछ नियमित मित्र-बंधु पोस्ट पर आदतन बधाई के संदेश दे भी देते हैं ताकि मनोबल बना रहे। बात यहीं नहीं रुकती, ऐसे 50-100 डिजिटल प्रमाणपत्रों के आधार पर रचनाओं का मूल्यांकन सर्वश्रेष्ठ मानकर फिर वह लेखक खोजता है कोई प्रकाशक कि वह मिल जाए जो रॉयल्टी दे दे। जब अंततः नहीं मिलता कोई ऐसा प्रकाशक तो फिर आ जाता है ‘सेल्फ़ पब्लिशिंग’ पर। किताब छपवाता है और फिर बाँटता फिरता है मित्र-मंडली में। अधिक हुआ तो ग्लैमर वाला विमोचन कार्यक्रम करवाकर फिर अख़बारी दफ़्तरों में ख़बरें भेजकर छपने का आग्रह और छपने के बाद उन अख़बारों की कतरनों को सोशल मीडिया पर चस्पा करके वही वाहवाही की प्रतीक्षा। आख़िर इन सब प्रपंचों के बीच जो मुख्य सरपंच था ‘गुरु’ या ‘उस्ताद’ उसे गौण करके स्वयंभू गुरु या सम्पादक बनकर रचनाधर्मिता के साथ जो अन्याय हो रहा है, उसका मूल ज़िम्मेदार बन जाता है।
पहले के दौर में रचनाकारों के सीखने-सिखाने के लिए एक समृद्ध मंच ‘गोष्ठी’ होता था, किन्तु आज वह गोष्ठी परम्परा प्रायः लुप्त होती नज़र आ रही है। जहाँ थोड़ी बहुत बची है, वहाँ यही होता है कि आप आओ, अपनी-अपनी ढपली, अपना-अपना राग की तरह अपनी रचना सुनाओ और चल दो चाय-समोसा खा कर। ऐसे में रचना के परिष्कृत होने की सभी संभावनाएँ समाप्त होने लगी हैं।
गोष्ठी असल सोने पर बौद्धिकता का मुलम्मा यानी कढ़ाई है। गोष्ठी एक बहुमुखी साधन है, जो ज्ञान के प्रसार, विचारों के संवर्धन, और सामुदायिक संबंधों के निर्माण के लिए एक उपयोगी मंच प्रदान करता है।
प्राचीन काल के काव्यमीमांसाकार राजशेखर ने काव्यपरीक्षण के लिये काव्यगोष्ठी की परंपरा दी है। प्राचीन काल की ऐसी काव्य गोष्ठियों में शास्त्रार्थ भी हुआ करते थे। कहा जाता है कि ऐसी गोष्ठियों का सभापतित्व वासुदेव, शालिवाहन हाल, शूद्रक और साहसांक विक्रमादित्य तक ने किया था।
मानसोल्लास के अनुसार सोमेश्वर के दरबार में कभी-कभी तीसरे पहर कवि गोष्ठियाँ भी हुआ करती थीं, जिनमें कवि, गायक, विद्वान् और न्यायिक राजसिंहासन के पास बैठकर भाग लिया करते थे।
सोचिए, हिन्दी के वर्तमान समाज ने कितनी सुहानी और आवश्यक परम्परा का स्वहित के लिए गला घोंट दिया जबकि अब भी हम चाहें तो हिन्दी में गुरु और गुरुकुल परम्परा का निर्वहन कर सकते हैं। उर्दू में आज भी ‘उस्ताद’ परम्परा ज़िंदा है, शागिर्द आज भी अपने शे’र या कहन के लिए उस्ताद से इस्लाह लेता है। हिन्दी साहित्य जगत् को जागना होगा, इस महनीय परम्परा का पुनर्गठन, पुनर्जीवन और पुनर्पाठ अत्यावश्यक है अन्यथा गुणवत्ता विहीन साहित्य से किसी का भला नहीं हुआ है, न आगे होगा।

डॉ. अर्पण जैन ’अविचल’

सम्पादक, मासिक साहित्यग्राम
इंदौर

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