संपादकीय

साहित्य से विलुप्ति की कगार पर ‘लोक’

दुर्भाग्य! दुःखद! चिंताजनक! अब क्या यही कहना रह गया है लोक के भाग्य में। विगत दो दशकों से साहित्य समाज की चिंताओं से निरंतर लोक, गाँव, परम्पराएँ, संस्कारशाला सब के सब धीरे-धीरे गायब हो रहा है। शहरी सीमाओं में आधुनिक दिखने और आधुनिक काल के सर्जक बनने की अंधी होड़ ने परिवेश और लोकमंगल की कामना का सत्यानाश करना आरंभ कर दिया।
वर्तमान समय के रचनाकारों में शहरी इमारतों की तरह स्वयं को ‘एलीट क्लास’ लेखक दिखाने की कुप्रवृत्ति ने गाँव और लोक को हेय का कारण बनाते हुए पीछे धकेलने का काम कर दिया है।
ललित निबंधों की परम्परा में लोक हमेशा जीवित रहा, सरदार पूर्ण सिंह, हज़ारीप्रसाद द्विवेदी, कुबेरनाथ रॉय, पंडित विद्यानिवास मिश्र, विवेकी रॉय, कृष्णबिहारी मिश्र की परम्परा में अब नर्मदाप्रसाद उपाध्याय, डॉ. नीरजा माधव जैसे महनीय साहित्यकारों तक तो लोक जीवित है किंतु चिंता इस बात की है कि वातानुकूलित कक्ष में बैठ कर गाँव लिखने वाले लेखक अब भी वही पुराने प्रतीकों और बिंबों का चित्र खींचते हैं, जो दशकों पूर्व ही गाँव से शहर आ गए।
कुछ वर्षों पूर्व एक निजी कंपनी के विज्ञापन में एक पंक्ति थी ‘जो रास्ते गाँव से शहर आते हैं, वे रास्ते शहर से वापस गाँव भी जाते हैं।’ अक्षरश: सत्य तो है पर विडम्बना यह है कि उन रास्तों से गए मुसाफ़िर शहरों की जनसंख्या तो बन गए पर उनके मानस से गाँव लुप्त हो रहे हैं।
बात निकली है तो यह जानना ज़रूरी है कि अब गाँव भी आधुनिक होते जा रहे हैं, मज़दूरों की जगह कटाई के स्थान पर हार्वेस्टिंग आरम्भ हो रही है, फटे कमीज़ और धोती-पायजामे की जगह जींस-पैंट लेती जा रही है, बैलगाड़ी की जगह टैक्टर से भर रहे हैं लोग परंतु आज भी मोहल्ले में किसी व्यक्ति का निधन हो जाने पर पूरे मोहल्ले की दुकानें अंत्येष्टि तक बंद कर देने वाला समाज आज भी गाँव में जीवित है।
आज भी गाय-बेलों के लिए अपने प्रियजन के समान ही चिंतित रहने वाले लोग गाँव में हैं, पड़ोसी के दुःख में दुःखी रहने वाली पौध लोक में है, जात-समाज से ऊपर किसी परिचित की बहन-बेटियों को भी अपनी ही बहन-बेटियों की तरह आदर देने वाले लोग आज भी गाँव में जीवित हैं, हर कन्या में लोक मंगल देखने वाले, भगवान से पहले लोक देवता का स्मरण करने वाले, फ़सल का उपयोग और बेचने से पहले पण्डित जी के घर कुछ अंश पहुँचाने वाले, लोक देव को अर्पित करने वाले, पेड़ पर चढ़कर आम, अमरूद और बोर तोड़कर खाने वाले बच्चे, गणगौर और गरबे का आनंद लेने वाला, पैंट के फटने पर रफू करके या लोक की भाषा में ‘कारी’ लगाकर पहनने वाला समाज आज भी लोक में रहता है।
समकालीन भारतीय साहित्यकारों में लोक केवल अब उपन्यासों में थोड़ा बहुत दिख रहा है जैसे राही मासूम रज़ा ने ‘आधा गाँव’ में विभाजन की विभीषिका के माध्यम से गाँव दिखाया, मैत्रेयी पुष्पा ने ‘पार’ उपन्यास में ग्रामीण स्त्री के संघर्ष और स्वाभिमान को दर्शाया, शम्भू चौधरी ने उपन्यास ‘मेरा गाँव’ में कोरोना के बाद का गाँव दिखाया, वही पुराने दौर में विवेकी रॉय ने ‘नमामि ग्रामम्’ के माध्यम से गाँवों के हो रहे विकास का चित्र खींचा था। हालिया लेखकों में आईपीएस अगम जैन के उपन्यास ‘कभी गाँव, कभी कॉलेज’ में गाँव के विस्तारवादी और बदलते स्वरूप का दृश्य है। ऐसे ही, गाँव के संदर्भ में कविताओं में चंद्रकांत देवताले ने लिखा था ‘गाँव तो थूक नहीं सकता था मेरी हथेली पर’ और विष्णु नागर की कविता ‘2020 में गाँव की ओर’ भी कमाल रही, वैसे ही इस समय की श्रेष्ठ मंचीय कवयित्री मनु वैशाली ने अपनी कविता ‘गाँव में क्या रखा है…’ के माध्यम से सार्थक और 21वीं सदी के गाँव का दृश्य उपस्थित किया है।
बीते दो दशकों में आई कविता, कहानी, लघुकथा और उपन्यास में अधिकांशतः लेखकों का कार्य गाँव को भूलकर लिखा गया कार्य है। जबकि भारतीय साहित्य का सबसे ख़ूबसूरत और मुस्कराता पक्ष उसका ‘लोक’ है, जिसमें मंगल की कामना है तो रंजन का भाव भी। प्रेमचंद, चन्द्रधर शर्मा गुलेरी, पदुमलाल पुन्नालाल बक्शी जैसे लोगों ने लोक को जीया और फिर लोक को लिखा, सतही नहीं बल्कि गहराई की मार्मिक उपस्थिति के साथ लोक का प्रस्तुतिकरण भी किया। उनका साहित्य इसलिए भी आजतक कालजयी बना हुआ है क्योंकि आज भी लोग उस लोक की पीड़ाओं के गीत ही पढ़ना पसंद करते हैं। किंतु वर्तमान के रचनाकार लोक को बिना जाने-पहचाने और बिना महसूस किए, बिना देखे ही केवल पढ़कर लोक लिख रहे हैं। शहरों के वातानुकूलित कक्ष या सभागार में बैठकर लोक पर चिंताएँ व्यक्त करके लोक लिखना चाहते हैं। लोक की शाब्दिक ऊष्मा को बिना सहन किए लोक का रेखाचित्र बनाना असम्भव-सा प्रतीत होता है।
गाँव को पढ़कर गाँव लिखने वाले लोग तो लोक नहीं संरक्षित कर सकते हैं, इसके लिए लोक को जी कर, उसमें रमकर, गोबरसनी मिट्टी की गंध को महसूस कर लिखने वाले लोगों के कारण ही लोक बचेगा।

डॉ. अर्पण जैन ’अविचल’

सम्पादक, मासिक साहित्यग्राम
इंदौर

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